संदेश

विष्णु प्रभाकर रचित 'मां' एकांकी का केंद्रीय भाव

विष्णु प्रभाकर रचित 'मां' एकांकी का केंद्रीय भाव विष्णु प्रभाकर ने 'मां' एकांकी के माध्यम से स्त्री मन की गुत्थी को सुलझाने का प्रयत्न किया है | आधुनिक युग में साहित्य की सभी विधाओं का जुड़ाव व्यक्ति के आंतरिक कुंठाओं से हुआ और यहीं से साहित्य में मनोविश्लेषण को प्रश्रय मिला | इस एकांकी में यह चित्रित किया गया है कि एक स्त्री को समाज सदैव अपने द्वारा निर्मित मापदंड के आधार पर परखना चाहता है | उसे (समाज को) स्त्री वैसी ही चाहिए जैसा कि वह कल्पना करता है जबकि स्त्री का मनोविकार इससे भिन्न होता है | मनीषी अपनी स्मृतियों में अपनी मां की उस छवि को धारण किए हुए हैं जो उसे चार वर्ष की अवस्था में छोड़कर दूसरा विवाह कर लेती है | मनीषी की मां उसे अपने साथ लेकर जाना तो चाहती थी लेकिन मनीषी को सदैव यही बतलाया गया कि उसकी मां उसे छोड़कर खुद की मर्जी से गई थी | यह तस्वीर मनीषी के मस्तिष्क में दीर्घ अवधि से छपी चली आई थी जो धीरे-धीरे इस कदर कुंठित हो उठा कि उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी मां के प्रति घृणा मात्र बनकर रह गया | एकांकी के आरंभ से तीन महीने पूर्व मनीषी को यह पता चल...

यशोधरा काव्य का प्रतिपाद्य

 यशोधरा काव्य का प्रतिपाद्य  यशोधरा काव्य का प्रणयन (रचना/लिखना) करने के पीछे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का मूल उद्देश्य गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा के त्याग, बलिदान, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठता का निरूपण करना है। इस काव्य में मूल रूप से बौद्ध धर्म और वैष्णव धर्म को समानांतर रूप से रेखांकित किया गया है। मैथिलीशरण गुप्त वैष्णव भक्त थे। यशोधरा काव्य में भी उनकी वैष्णव भक्ति स्थान-स्थान पर प्रकट हुई है। कई जगहों पर जब वैष्णव धर्म और बौद्ध धर्म की टकराहट होती है तब वहां मैथिलीशरण गुप्त वैष्णव धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। बौद्ध धर्म का मूल प्रतिपाद्य मुक्ति है और वैष्णव धर्म मुक्ति के स्थान पर भक्ति की कामना करता है इस काव्य के मंगलाचरण में गुप्तजी ने लिखा है मुक्ति, मुक्ति मांगू क्या तुझसे हमें भक्ति दो ओ अमिताभ। आगे चलकर इस काव्य में गौतम बुद्ध के चरित्रों की श्रेष्ठता तो दिखलाई जाती है लेकिन यशोधरा जो कि वैष्णव धर्म के सिद्धांतों को मानने वाली है उसके विचारों की श्रेष्ठता बौद्ध धर्म से उपर रखी गयी है। बौद्ध धर्म में मनुष्य के जिस वृद्धावस्था को लेकर चिंतन किया गया है। उ...

जैनेंद्र के कथा साहित्य का स्वरूप

जैनेंद्र के कथा साहित्य का स्वरूप हिंदी कथा साहित्य, जिसकी परंपरा तो अत्यंत दीर्घ रही है लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपने शुरुआती दौर में ही नहीं बल्कि बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक इसका स्वरूप मनोरंजनपरक एवं उपदेशात्मक रहा है। कथा साहित्य में यथार्थ भूमि और जन जीवन की समस्याओं का घोर अभाव था। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के पूर्व कहानी और उपन्यासों की एक लंबी परंपरा रही है। वहां शैली, पठनीयता आदि में कोई कमी नहीं थी। भाषा को सुदृढ़ करने में भी उनका अहम योगदान रहा है। पाठकों को बांधकर रखने की क्षमता तो जासूसी और तिलस्मी-ऐयारी उपन्यासों-कहानियों में अद्भुत रहा है। यदि कोई कमी रही है तो बस इतनी कि उसका जुड़ाव जनजीवन की समस्याओं से नहीं था। कथा साहित्य की इस कमी को भी प्रेमचंद ने पूरा कर दिया। प्रेमचंद की कहानियों-उपन्यासों में जनजीवन की समस्याएं आदर्शवादी यथार्थ और आगे चलकर अपने पूर्ण यथार्थ के साथ उपस्थित हैं। प्रेमचंद ने जब हिंदी कथा-साहित्य में जीवन की समस्याओं को कथानक के रूप में अपनाया तब उसके बाद अनेक रचनाकार इस मार्ग पर अग्रसर हुएं। प्रेमचंद और उनके परंपरा के कथाका...

जैनेन्द्र की 'पत्नी' कहानी का समीक्षात्मक परिचय ।

जैनेन्द्र की 'पत्नी' कहानी का समीक्षात्मक परिचय । जैनेंद्र कुमार मनोविश्लेषणवादी कथाकार के रूप में हिंदी साहित्य में विख्यात हैं। मनोविश्लेषणवादी कथा साहित्य में पात्रों के मनोभावों का विश्लेषण करते हुए उसके अंदर की गूथियों को, मन के अंदर के उलझनों को सुलझाने का प्रयत्न किया जाता है। वहां ध्यान यह रखा जाता है कि जिस पात्र के माध्यम से कथानक को बुना जा रहा है उस पात्र के बाहर के वातावरण का चित्रण उतना ही किया जाता है जितना कि उस पात्र के मानसिक उद्रेक को सुलझाने के लिए आवश्यक हो। कथानक में पात्र के इर्द-गिर्द के जन जीवन की समस्याओं के स्थान पर पात्र के मनोभावों को दर्शाते हुए उसकी मानसिक दशा को अधिक महत्व दिया जाता है। जैनेंद्र कुमार की कहानियों में एक और बात जो उभर कर आती है वह यह है कि उन्होंने अधिकांश कहानियों और उपन्यासों में स्त्रियों को केंद्र में रखा है और उस पात्र के माध्यम से स्त्री मनोदशा का वर्णन किया है। यहां यह भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, भारतीय जनजीवन, भारतीय परिवार की अवधारणा आदि का पोषण भी किया है। वे संयु...