जैनेन्द्र की 'पत्नी' कहानी का समीक्षात्मक परिचय ।

जैनेन्द्र की 'पत्नी' कहानी का समीक्षात्मक परिचय ।

जैनेंद्र कुमार मनोविश्लेषणवादी कथाकार के रूप में हिंदी साहित्य में विख्यात हैं। मनोविश्लेषणवादी कथा साहित्य में पात्रों के मनोभावों का विश्लेषण करते हुए उसके अंदर की गूथियों को, मन के अंदर के उलझनों को सुलझाने का प्रयत्न किया जाता है। वहां ध्यान यह रखा जाता है कि जिस पात्र के माध्यम से कथानक को बुना जा रहा है उस पात्र के बाहर के वातावरण का चित्रण उतना ही किया जाता है जितना कि उस पात्र के मानसिक उद्रेक को सुलझाने के लिए आवश्यक हो। कथानक में पात्र के इर्द-गिर्द के जन जीवन की समस्याओं के स्थान पर पात्र के मनोभावों को दर्शाते हुए उसकी मानसिक दशा को अधिक महत्व दिया जाता है। जैनेंद्र कुमार की कहानियों में एक और बात जो उभर कर आती है वह यह है कि उन्होंने अधिकांश कहानियों और उपन्यासों में स्त्रियों को केंद्र में रखा है और उस पात्र के माध्यम से स्त्री मनोदशा का वर्णन किया है। यहां यह भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, भारतीय जनजीवन, भारतीय परिवार की अवधारणा आदि का पोषण भी किया है। वे संयुक्त परिवार की वकालत करते हुए भारतीय परिवेश में जिस तरह के पारिवारिक वातावरण देखने को मिलता है उसको तोड़ने या खंडित करने में जैनेंद्र कुमार यकीन नहीं रखते हैं।
जैनेंद्र कुमार की सर्वाधिक प्रचलित कहानियों में 'पत्नी' कहानी का प्रमुख स्थान है। इस कहानी की केंद्रीय पात्र सुनंदा है। सुनंदा का पति कालिंदीचरण भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय आंदोलनकारी है। उसका वर्णन इस कहानी में है लेकिन कहानी में कालिंदीचरण का चित्रण स्वाधीनता आंदोलन के नायक के रूप में विस्तारित न होकर सुनंदा के पति के रूप में विस्तारित है। जो सुनंदा के चरित्र को, उसके मनोविश्लेषण को विस्तारित करने में सहायता प्रदान करता है।
सुनंदा की शिक्षा थोड़ी कम है। वह बार-बार सोचती है कि देश क्या है ? सरकार क्या है ? आजादी क्या है ? स्वाधीनता क्या है ? ये बातें मैं नहीं समझ पाती हूं लेकिन मेरे पति जब इन बातों की चर्चा अपने मित्रों और अपने सहयोगियों से कर सकते हैं तो फिर मुझसे क्यों नहीं ? वह चाहती है कि उसका पति उसे समय दें, जो चीजें वह नहीं समझती है वह उसे समझाएं। अपने साथ सम्मिलित होने का, दुःख-सुख को बांटने का अवसर प्रदान करें। कालिंदीचरण अपनी पत्नी को इन बातों में सम्मिलित नहीं करता है। यही चीजें सुनंदा को भीतर ही भीतर कचोटती रहती है। पति देर से आता है,  उसके साथ कुछ और मित्र आ जाते हैं जिसकी खबर पहले से सुनंदा को नहीं है। अंततः वह अपने और अपने पति का पूरा खाना पति और उसके दोस्तों के सामने परोस देती है। वह अपने लिए खाने पीने को कुछ बचा कर नहीं रखती है। अंगीठी बुझ जाने के कारण फिर से खाना बनाना भी संभव नहीं है। उसके मन में यह बात उठती है कि उसने घर का सारा खाना पति के सामने दे दिया, उसके पति ने एक बार भी उससे यह क्यों नहीं पूछा कि तुमने अपने लिए कुछ बचा कर रखा है या नहीं ? यहां कहानी में यह भाव उभर कर आता है कि स्त्री अपने आप को त्याग और बलिदान के निमित्त सदैव शीर्ष पर रखने को उद्यत होती है। वह सोचती है कि मेरे मन में यह बात आई भी कैसे ? मैंने तो एक दिन अपने पति को या उसके मित्रों को अपने हिस्से का भोजन करा कर पुण्य ही अर्जित किया है। सुनंदा अक्सर घर में अकेली ही होती है। पति स्वाधीनता आंदोलन में अपने सहयोगियों के साथ सक्रिय है और इस दौरान उसे बार-बार अपने बच्चे की याद आती है जो किसी कारण से मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। बार-बार उसे याद करती है, उन यादों से पीछा छुड़ाने का प्रयत्न करती है और फिर से उन्हीं यादों में लिपटकर दुखी हो जाती है। वह चाहती है कि वह अपने आप को किसी अन्य काम में इस तरह लगा दे, खुद को इस तरह से उलझा दे कि उसे अतीत में दोबारा जाने का अवसर ही न मिले। लेकिन घर का एकांत और जीवन का अकेलापन उसे बार-बार अतीत में ले जाता है । यहां एक ही स्त्री के मनोभावों का कुशल चित्रण करने में कथाकार सफल सिद्ध हुए हैं। कालिंदीचरण के आने पर जब वह इस तरह का व्यवहार करता है कि जैसे आने में देरी के कारण या फिर दो आदमी का खाना बना होने के बावजूद चार आदमी से आ जाने के कारण  वह लज्जित है तब सुनंदा व्यथित हो उठती है। वह चाहती है कि उसका पति पूरे अधिकार से उसे कहे कि और ज्यादा खाना बना दो तो वह खुशी-खुशी बना देती लेकिन वह अपराधी के जैसा व्यवहार कर रहा है। यह बात सुनंदा को तकलीफ देती है। एक तो वह दिन भर घर में अकेली पड़ी रहती है, पुरानी यादों को उधेड़ती बुनती रहती है इस कारण से उसका मन झूंझला उठता है। जितनी देर भी उसका पति घर पर रहता है उतनी देर उसके व्यवहार में बनावटीपन को देखकर वह क्रुद्ध हो जाती है।
कहानी में स्त्री मनोविज्ञान का चित्रण करने के दौरान जैनेंद्र कुमार ने स्त्री को आधुनिक संदर्भ में स्वावलंबी बनने के लिए छटपटाते नहीं दिखलाया है। वह भारतीय परंपरा के अनुसार अपने पति की अधीनता स्वीकारती है। खुद को पति की सेविका मानती है। कालिंदीचरण को घर आने में देर होती है। वह बारह-एक बजे जब भी आए सुनंदा उसे खाना खिला कर ही खाती है। उसका मन झूंझलाता है लेकिन उसे तकलीफ इस बात की नहीं है कि कालिंदीचरण के देर से आने के कारण वह देर से खाना खा पाती है। बल्कि उसे तकलीफ इस बात का है कि कालिंदीचरण अपना ख्याल क्यों नहीं रखता है। समय पर खाना क्यों नहीं खाता है ? भारतीय परंपरागत स्त्री की चरित्रिक विशेषता को इस कहानी में जैनेंद्र कुमार ने आदर्श रूप में रूपायित किया है। कहानी में कथा का प्रवाह सीमित है कथाकार का मूल उद्देश्य कथा को विस्तारित न करके स्त्री पात्र सुनंदा की चरित्रिक मनोभावों को चित्रित करना है। एक ऐसी स्त्री जो अपना जीवन एकांत और एकाकीपन में गुजार रही है वह खुद को पति के साथ मुख्यधारा में लाना तो चाहती है किंतु पति उसे अपने साथ नहीं लेता है। वह घर के कामकाज तक में सीमित हो जाती है। उसके मनो-ग्रंथियों को बड़े ही सुंदर रूप में इस कहानी में चित्रित किया गया है। अपने लघु कलेवर में ही कहानी केंद्रीय पात्र सुनंदा के मनोविज्ञान को पाठकों के समक्ष मनमोहक रूप में प्रकट कर देती है।

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